एनजीटी सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु न्याय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर जोर

नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने रविवार को नई दिल्ली में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन ‘पर्यावरण और जलवायु गतिशीलता का भविष्य’ के समापन सत्र को संबोधित किया। सम्मेलन का समापन एक सतत, जुझारू और न्यायसंगत भविष्य के लिए पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं को प्रभावी कार्रवाई में बदलने, मजबूत संस्थानों के निर्माण और निरंतर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर जोर के साथ हुआ। समापन सत्र में केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों और विद्युत मंत्री मनोहर लाल, सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता मौजूद रहे।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में पर्यावरण प्रशासन को मजबूत करने में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की भूमिका की सराहना की। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान पर आधारित जन-केंद्रित और समुदाय-आधारित अनुकूलन दृष्टिकोणों के जरिए जलवायु सुदृढ़ीकरण पर जोर दिया। उन्होंने पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनके अनुभवों को महत्व देने की आवश्यकता रेखांकित की।
मनोहर लाल ने तीव्र विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने के भारत के प्रयासों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि देश की कुल स्थापित ऊर्जा उत्पादन क्षमता का लगभग 55% गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी 50% गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य निर्धारित समय से पांच साल पहले ही हासिल कर लिया है। मंत्री ने सतत शहरी विकास, जल सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन, हरित गतिशीलता और इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़ी पहलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सकारात्मक और सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि पर्यावरण प्रशासन को विकास और संरक्षण तथा वर्तमान जरूरतों और भविष्य के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। इसमें विभिन्न समुदायों और पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पर्यावरण-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर बदलाव का उल्लेख करते हुए प्रभावी संस्थानों, प्रवर्तन, पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय तक पहुंच पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान, प्रदूषण और जल संकट जैसी परस्पर जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न न्यायक्षेत्रों के बीच सहयोग, ज्ञान का आदान-प्रदान और देशों के बीच साझा उत्तरदायित्व जरूरी है।
एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि दो दिन की चर्चाओं ने पर्यावरणीय चुनौतियों की पहचान करने से आगे बढ़कर उनसे निपटने में सक्षम कानूनों, संस्थानों और साझेदारियों के निर्माण की आवश्यकता को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए संवेदनशील समुदायों और भावी पीढ़ियों को ध्यान में रखते हुए समावेशी और न्यायसंगत कार्रवाई जरूरी है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण कानून को उत्तरदायी और भविष्योन्मुखी बने रहना चाहिए। इसमें प्रौद्योगिकी, नवाचार, सतत वित्त और न्यायसंगत बदलाव जैसे पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए कानून, शासन, विज्ञान, अर्थशास्त्र और समाज के संयुक्त ज्ञान की आवश्यकता है। उन्होंने वैज्ञानिक आकलन, नवाचार और सतत विकास के समर्थन से जैव विविधता संरक्षण को जलवायु परिवर्तन से निपटने और विकास के साथ संतुलित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण मानव प्रगति में बाधा नहीं, बल्कि सतत प्रगति की एक शर्त है। इसके लिए सशक्त संस्थाओं, प्रभावी कार्यान्वयन और जिम्मेदार शासन की आवश्यकता है।
इस अवसर पर मनोहर लाल ने ‘हरित न्यायम’ शीर्षक से एनजीटी की स्मारिका का विमोचन किया और इसकी पहली प्रति राष्ट्रपति को भेंट की। यह दस्तावेज न्यायाधिकरण की स्थापना, विकास और उपलब्धियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें सम्मेलन के दौरान सामने आए विचारों, दृष्टिकोणों और सामूहिक संकल्प को भी दर्ज किया गया है। यह नीति निर्माताओं, विधि समुदाय और नागरिकों के लिए संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोगी होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 सितंबर 2026 को दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन किया था। इसमें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और एशियाई विकास बैंक (एडीबी) के प्रतिनिधियों के साथ 17 देशों के न्यायविद, शिक्षाविद, नीति निर्माता, वैज्ञानिक, पर्यावरण विशेषज्ञ और अन्य हितधारक शामिल हुए। सम्मेलन में न्यायिक, वैज्ञानिक, नीतिगत और संस्थागत सर्वोत्तम प्रथाओं पर संवाद तथा ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए मंच उपलब्ध कराया गया। साथ ही पर्यावरण और जलवायु से जुड़ी गंभीर चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोगात्मक कार्रवाई पर चर्चा हुई।